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EMOTIONAL MOTIVATION STORY - एक वजह, जो ज़िंदा रहने को काफी थी

 सीमा सिर्फ 25 साल की थी, जब उसकी ज़िंदगी एक झटके में बदल गई।

एक सड़क हादसे ने उससे उसका पति छीन लिया। उस वक्त सीमा गर्भवती थी।
दर्द, डर और अनिश्चित भविष्य — तीनों एक साथ उसके सामने खड़े थे।

कुछ महीनों बाद सीमा ने एक बेटे को जन्म दिया।
वही बच्चा उसकी ज़िंदगी की आख़िरी उम्मीद बन गया।

हालात बेहद खराब थे।
न कोई सहारा, न पैसे, न कोई पूछने वाला।
फिर भी सीमा ने हार नहीं मानी।

वो लोगों के घरों में झाड़ू-पोछा करने लगी,
दिन-रात मेहनत की,
और अपने बेटे को पढ़ाया-लिखाया।

सालों बाद वही बेटा देश की सेना में एक अच्छी पोस्ट पर पहुंचा।
सीमा को लगा —
“मेरी सारी तकलीफ़ें अब रंग ला गईं।”

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।

एक आतंकी हमले में उसका बेटा वीरगति को प्राप्त हो गया।
देश ने एक सपूत खोया…
और सीमा ने अपनी पूरी दुनिया।

अब उसके पास न कोई सपना था,
न कोई सहारा,
न जीने की कोई वजह।

उसे अपना जीवन व्यर्थ लगने लगा।
उसने सब कुछ खत्म करने का फैसला कर लिया।

लेकिन ठीक उसी पल…
रसोई से बर्तनों के गिरने की आवाज़ आई।

सीमा चौंककर किचन में गई।

वहाँ एक छोटी-सी बिल्ली खड़ी थी —
डरी हुई, सहमी हुई, कांपती हुई।

उसकी आँखों में डर था,
लेकिन मासूमियत भी।

सीमा का दिल पिघल गया।

उसने बिल्ली को धीरे-से सहलाया,
उसे दूध पिलाया,
और पहली बार बहुत दिनों बाद…
उसके चेहरे पर मुस्कान आई।

उस पल सीमा को एहसास हुआ —

“अगर कोई मेरी ज़िंदगी पर निर्भर है,
तो मेरा जीना बेकार कैसे हो सकता है?”

उसने अपना फैसला बदल दिया।
उस बिल्ली को अपना सहारा बना लिया।

आज सीमा और वो बिल्ली साथ रहते हैं।
एक-दूसरे की वजह से।

कभी-कभी ज़िंदगी हमें
कोई बड़ा कारण नहीं देती जीने का,
बस एक छोटी-सी ज़िम्मेदारी दे देती है।

और वही…
ज़िंदगी बदलने के लिए काफी होती है।

संदेश

हर अंधेरे के बाद रोशनी ज़रूर होती है —
कभी इंसान बनकर,
तो कभी एक मासूम जानवर बनकर।

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